दल्ली राजहरा आयरन ओर कॉम्प्लेक्स पर बड़ा सवाल: SAIL की EC, BOO ऑपरेटर और कोडेकसा की गतिविधियों की होगी जांच?

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17 अप्रैल 2015 की पर्यावरण स्वीकृति को लेकर उठे गंभीर सवाल, श्री जगन्नाथ स्टील एंड पावर लिमिटेड को BOO अनुबंध मिलने के बाद EC ट्रांसफर की वैधानिकता जांचने की मांग
बालोद/डौंडी। ग्राम कोडेकसा स्थित दल्ली राजहरा आयरन ओर कॉम्प्लेक्स में प्रस्तावित 1.0 एमटीपीए पैलेट प्लांट एवं अपस्ट्रीम स्लाइम बेनिफिएशन प्लांट को लेकर पर्यावरणीय स्वीकृति, परियोजना दस्तावेजों और संचालन व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। कोडेकसा पर्यावरण एवं जन कल्याण समिति ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय सहित संबंधित विभागों को शिकायत सौंपकर पूरे मामले की उच्च स्तरीय एवं स्वतंत्र जांच की मांग की है।
SAIL के नाम EC तो BOO ऑपरेटर को संचालन का अधिकार कैसे?
शिकायत में दावा किया गया है कि 17 अप्रैल 2015 को मूल Environmental Clearance (EC) SAIL के नाम जारी हुई थी। वहीं परियोजना के संचालन के लिए BOO (Build, Own, Operate) व्यवस्था के तहत मैसर्स श्री जगन्नाथ स्टील एंड पावर लिमिटेड को अनुबंध दिए जाने का उल्लेख किया गया है।
यही बिंदु अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है।

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क्या SAIL के नाम जारी मूल EC को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत BOO ऑपरेटर के नाम वैध रूप से ट्रांसफर किया गया था?
समिति ने इसी सवाल पर संबंधित विभागों से EC transfer application, transfer order और उससे जुड़े सभी दस्तावेज सार्वजनिक/सत्यापित करने की मांग की है।
19 हेक्टेयर क्षेत्रफल और ग्राम कोडेकसा के खसरा नंबरों पर भी सवाल
शिकायत के अनुसार मूल पर्यावरणीय स्वीकृति में 19 हेक्टेयर क्षेत्रफल और दल्ली राजहरा का उल्लेख है। ऐसे में यह भी जांच का विषय बताया गया है कि वर्तमान परियोजना स्थल ग्राम कोडेकसा में दर्ज संबंधित खसरा नंबरों से मूल EC में दर्ज परियोजना स्थल का वास्तविक मिलान होता है या नहीं।
समिति का कहना है कि राजस्व रिकॉर्ड, परियोजना प्रस्ताव, EC दस्तावेज और वर्तमान स्थल का भौतिक सत्यापन कर यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि मौजूदा गतिविधियां उसी स्वीकृत परियोजना के दायरे में हैं या नहीं।
EC ट्रांसफर हुआ या नहीं? दस्तावेजों की होगी असली परीक्षा
EIA Notification, 2006 के पैरा 11 के तहत EC के हस्तांतरण की व्यवस्था है। ऐसे में जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा यह होना चाहिए कि—
मूल EC किस परियोजना प्रस्तावक के नाम जारी हुई?
EC transfer के लिए आवेदन कब और किसके द्वारा किया गया?
ट्रांसफर की अनुमति किस सक्षम प्राधिकरण ने दी?
transferor और transferee की सहमति क्या थी?
क्या परियोजना की पहचान, स्थान और क्षमता मूल EC से मेल खाते हैं?
वर्तमान ऑपरेटर के नाम वैध पर्यावरणीय स्वीकृति उपलब्ध है या नहीं?
इन सवालों के जवाब दस्तावेजों से ही स्पष्ट होंगे।
मामला सिर्फ EC तक सीमित नहीं, CTE और CTO की भी जांच जरूरी
यदि परियोजना में औद्योगिक गतिविधियां, उत्सर्जन, अपशिष्ट या effluent से जुड़ी गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो केवल EC ही नहीं बल्कि प्रदूषण नियंत्रण से संबंधित वैधानिक अनुमतियों की स्थिति भी जांच के दायरे में आ सकती है।
समिति ने Consent to Establish (CTE) और Consent to Operate (CTO) सहित अन्य अनुमतियों की जांच की मांग की है।
Water Act, 1974 और Air Act, 1981 के तहत औद्योगिक गतिविधियों के लिए लागू वैधानिक सहमतियों और प्रदूषण नियंत्रण संबंधी प्रावधानों का पालन आवश्यक होता है। इसलिए संबंधित अवधि में परियोजना के पास कौन-कौन सी वैध अनुमति थी, इसकी स्वतंत्र जांच अहम मानी जा रही है।
जांच में इन दस्तावेजों पर रहेगी नजर
पूरे मामले की निष्पक्ष जांच में कम से कम इन रिकॉर्ड का परीक्षण किया जाना चाहिए—
▶ 17 अप्रैल 2015 की मूल EC और उसकी सभी शर्तें।
▶ EC में दर्ज परियोजना स्थल एवं क्षेत्रफल।
▶ ग्राम कोडेकसा के संबंधित खसरा नंबरों का राजस्व रिकॉर्ड।
▶ SAIL और BOO ऑपरेटर के बीच हुए अनुबंध।
▶ EC transfer application और transfer order।
▶ वर्तमान परियोजना प्रस्तावक/ऑपरेटर के नाम EC की स्थिति।
▶ CTE और CTO की वैधता एवं अवधि।
▶ परियोजना की क्षमता, तकनीक, स्थान या गतिविधियों में हुए बदलाव।
▶ पर्यावरणीय शर्तों के अनुपालन की निरीक्षण रिपोर्ट।
▶ स्लाइम, खनिज, अपशिष्ट एवं परिवहन से संबंधित रिकॉर्ड।
▶ किसी अवधि में अनुमति के बिना गतिविधि हुई या नहीं, इसका सत्यापन।
समिति की मांग—जांच पूरी होने तक संदिग्ध गतिविधियों पर नियंत्रण
कोडेकसा पर्यावरण एवं जन कल्याण समिति ने मांग की है कि मामले की निष्पक्ष उच्च स्तरीय जांच कराई जाए। साथ ही जिन पर्यावरणीय गतिविधियों अथवा परिवहन के लिए वैध अनुमति का प्रमाण उपलब्ध नहीं है, उनकी जांच पूरी होने तक उन्हें नियंत्रित अथवा रोकने पर सक्षम स्तर पर विचार किया जाए।
हालांकि, शिकायत में लगाए गए आरोप अपने आप में उल्लंघन सिद्ध नहीं करते। वास्तविक स्थिति संबंधित EC transfer records, consent orders, राजस्व दस्तावेजों, विभागीय निरीक्षण रिपोर्ट और अन्य आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
अब सबसे बड़ा सवाल—SAIL की EC के बाद BOO ऑपरेटर को अधिकार किस आदेश से मिला?
पूरे मामले में अब निगाहें MoEFCC/सक्षम पर्यावरणीय प्राधिकरण, छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन पर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या SAIL के नाम जारी 2015 की EC के आधार पर वर्तमान BOO ऑपरेटर को परियोजना संचालित करने का वैधानिक पर्यावरणीय अधिकार मिला है?
और यदि जांच में EC, CTE, CTO या अन्य वैधानिक अनुमतियों की शर्तों का उल्लंघन सामने आता है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी और नियमानुसार क्या कार्रवाई होगी?
दल्ली राजहरा–कोडेकसा आयरन ओर कॉम्प्लेक्स से जुड़ा यह मामला अब सिर्फ एक परियोजना की अनुमति का सवाल नहीं, बल्कि पर्यावरणीय स्वीकृति, परियोजना संचालन और नियामकीय पारदर्शिता की परीक्षा बनता नजर आ रहा है।

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