नेशनल लोक अदालत पर बड़े सवाल: जनता का विश्वास डगमगाया? जिम्मेदार कौन?

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पक्षकारों की गैरमौजूदगी से लेकर ‘तारीख पर तारीख’ तक उठे सवाल, शिवशंकर सिंह ने मांगा जवाबदेही तय करने का सिस्टम

राज्य/जिला संवाददाता।
आम नागरिकों को त्वरित, सस्ता और सुलभ न्याय दिलाने के उद्देश्य से 12 सितंबर को आयोजित नेशनल लोक अदालत को लेकर अब व्यवस्था की जमीनी कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। कर्त्तव्य न्याय भागीदारी आंदोलन भारत के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवशंकर सिंह ने लोक अदालत की प्रक्रिया, नागरिकों की भागीदारी और वास्तविक समाधान को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए जिम्मेदार संस्थाओं से जवाबदेही तय करने की मांग की है।

शिवशंकर सिंह का कहना है कि लोक अदालत से करीब एक सप्ताह पहले से ही उन्होंने संबंधित अधिकारियों और संस्थाओं का ध्यान संभावित समस्याओं की ओर आकर्षित करने का प्रयास किया था। उनका आरोप है कि इन सवालों को अपेक्षित गंभीरता से नहीं लिया गया। अब लोक अदालत के आयोजन के बाद वे इन्हीं मुद्दों पर जमीनी मूल्यांकन और जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

पक्षकार ही नहीं पहुंचे तो समाधान कैसे होगा?

लोक अदालत का मूल आधार आपसी सहमति और समझौते के माध्यम से विवादों का शीघ्र निपटारा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि किसी मामले में आवश्यक पक्षकार ही उपस्थित न हों, तो समझौते की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी?

सवाल यह भी है कि क्या सभी संबंधित पक्षकारों को समय पर सूचना दी गई? क्या उन्हें लोक अदालत में मामले के निपटारे की प्रक्रिया और संभावित लाभों की पर्याप्त जानकारी दी गई?

कार्यपालिका से राहत नहीं तो न्यायिक व्यवस्था पर बढ़ेगा बोझ?

शिवशंकर सिंह ने प्रशासनिक शिकायतों के समयबद्ध निराकरण को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि आम नागरिक पहले जनदर्शन और प्रशासनिक अधिकारियों के माध्यम से अपनी शिकायतों के समाधान की उम्मीद करता है। यदि वहां समाधान नहीं मिलता, तो मामला न्यायालय या अन्य कानूनी मंचों तक पहुंचता है।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक स्तर पर शिकायतों के समयबद्ध समाधान की व्यवस्था पर्याप्त प्रभावी है?

यदि प्रशासनिक विवादों का शुरुआती स्तर पर समाधान नहीं होगा, तो क्या इसका सीधा असर न्यायालयों पर पड़कर लंबित मामलों का बोझ बढ़ाता रहेगा?

जागरूकता अभियान पर भी सवाल

लोक अदालत की सफलता केवल आयोजन और प्रकरणों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। आम नागरिक को यह जानकारी होना जरूरी है कि उसका मामला लोक अदालत में आ सकता है या नहीं, किन मामलों में समझौता संभव है और इसके लिए किस प्रक्रिया का पालन करना होगा।

इसी को लेकर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की कानूनी जागरूकता और जनसंपर्क व्यवस्था पर भी सवाल उठाए गए हैं।

‘तारीख पर तारीख’ से परेशान आम आदमी!

न्याय की उम्मीद में वर्षों तक मुकदमा लड़ने वाले नागरिक के लिए हर अगली तारीख आर्थिक और मानसिक बोझ बन सकती है। हालांकि प्रत्येक मामले में देरी के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, लेकिन समयबद्ध न्याय और लंबित मामलों के प्रभावी निपटारे को लेकर सार्वजनिक बहस जरूरी है।

सवाल यह है कि लोक अदालत जैसी व्यवस्था वास्तव में लंबित मामलों के बोझ को कम करने और नागरिकों को शीघ्र राहत देने में कितनी प्रभावी साबित हो रही है?

बैंक से लेकर बिजली और नगर निगम तक—राहत कितनी?

बैंक, बिजली विभाग, BSNL, वित्तीय संस्थानों और नगर निगम से जुड़े विवाद आम नागरिकों के रोजमर्रा के जीवन से सीधे जुड़े हैं।

ऐसे मामलों में लोक अदालत के माध्यम से वास्तविक समाधान और राहत मिलने की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि क्या नागरिकों को मौके पर संतोषजनक समाधान मिल रहा है या लोक अदालत भी एक औपचारिक प्रक्रिया तक सीमित होती जा रही है?

एक सप्ताह पहले उठाए सवालों पर अब जवाब की मांग

शिवशंकर सिंह का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब लोक अदालत से पहले ही नागरिकों की भागीदारी, जागरूकता और वास्तविक समाधान को लेकर संबंधित अधिकारियों का ध्यान आकर्षित किया गया था, तो इन चिंताओं पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

उनका कहना है कि यदि समय रहते जागरूकता अभियान को मजबूत किया जाता, संबंधित विभागों को जवाबदेह बनाया जाता और पक्षकारों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की जाती, तो लोक अदालत के परिणाम और बेहतर हो सकते थे।

अब सिर्फ आंकड़े नहीं, वास्तविक सफलता का हिसाब चाहिए

लोक अदालत की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि कितने प्रकरण सूचीबद्ध हुए और कितने मामलों का निपटारा दर्ज किया गया। असली सवाल यह है कि—

कितने नागरिकों को वास्तविक राहत मिली?
कितने विवादों का संतोषजनक समाधान हुआ?
कितने मामलों में पक्षकारों को मौके पर समाधान मिला?
और कितने मामलों में नागरिकों को फिर अगली तारीख का इंतजार करना पड़ा?

शिवशंकर सिंह ने जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, न्यायिक व्यवस्था, कार्यपालिका, संबंधित विभागों, वित्तीय संस्थानों और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से लोक अदालत की जमीनी सफलता का स्वतंत्र मूल्यांकन कराने और आवश्यकता होने पर जिम्मेदारी तय करने की मांग की है।

अब देखने वाली बात यह होगी कि इन सवालों पर संबंधित जिम्मेदार संस्थाएं क्या जवाब देती हैं और क्या नेशनल लोक अदालत की वास्तविक सफलता का कोई स्वतंत्र एवं पारदर्शी मूल्यांकन किया जाएगा।

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