डोंगरगांव में सूदखोरी का खौफनाक चेहरा: बंधक बनाकर चाकू की नोक पर हड़पी किसानों की जमीनें, फर्जी रजिस्ट्री के सनसनीखेज आरोप

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2 साल में 93 पेशियां, फिर भी नहीं मिला न्याय; त्रस्त किसानों ने राष्ट्रपति से मांगी सामूहिक इच्छा मृत्यु की अनुमति

रिपोर्ट: विशेष संवाददाता | Sansani Times

राजनांदगांव। छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के डोंगरगांव, कुमर्दा, छुरिया और अंबागढ़ चौकी क्षेत्र से सामने आए एक गंभीर मामले ने सूदखोरी के कथित संगठित नेटवर्क और प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के 12 किसानों ने आरोप लगाया है कि एक प्रभावशाली सूदखोर और उसके सहयोगियों ने कर्ज के नाम पर उनकी पुश्तैनी कृषि भूमि पर कब्जा करने के लिए फर्जी दस्तावेजों, धमकी, मारपीट और अवैध दबाव का सहारा लिया।

पीड़ित किसानों ने मीडिया के माध्यम से चेतावनी दी है कि यदि आगामी दो महीनों के भीतर उन्हें न्याय नहीं मिला और उनकी जमीनें वापस नहीं की गईं, तो वे परिवार सहित उग्र भूख हड़ताल करेंगे तथा राष्ट्रपति को सामूहिक इच्छा मृत्यु की अनुमति हेतु आवेदन भेजेंगे।


2008-09 में लिया था कर्ज, ब्याज सहित चुकाने के बाद भी नहीं लौटाए गए दस्तावेज

किसानों के अनुसार वर्ष 2008-09 के दौरान घरेलू एवं कृषि कार्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन्होंने तत्कालीन साहूकार स्वर्गीय माणिक गांधी से ब्याज पर अल्पकालीन ऋण लिया था।

आरोप है कि ऋण देते समय किसानों से उनकी ऋण पुस्तिका (परचा भाग-01), पासपोर्ट फोटो और कई कोरे स्टांप पेपरों पर हस्ताक्षर कराकर उन्हें अपने पास रख लिया गया।

किसानों का दावा है कि उन्होंने समय रहते ब्याज सहित संपूर्ण ऋण राशि का भुगतान कर दिया था। इसके बावजूद जब उन्होंने अपनी ऋण पुस्तिका और दस्तावेज वापस मांगे तो उन्हें लगातार टालमटोल का सामना करना पड़ा।


माणिक गांधी की मृत्यु के बाद बेटे ने संभाला कथित सूदखोरी नेटवर्क

प्रेस विज्ञप्ति में आरोप लगाया गया है कि माणिक गांधी की मृत्यु के बाद उनके पुत्र सुमीत अमीत गांधी ने अपने कथित मुनीमों द्वारिका प्रसाद साहू, सोहन मंडावी, अजय वैष्णव और रामनरेश उर्फ झग्गर के साथ मिलकर इस पूरे नेटवर्क को संचालित करना शुरू किया।

किसानों का कहना है कि जब उन्होंने अपने दस्तावेज वापस मांगे तो उन्हें डोंगरगांव पुराने थाना क्षेत्र के समीप एक सुनसान मकान में बुलाया गया, जहां उन्हें घंटों तक बंधक बनाकर रखा गया।


चाकू की नोक पर दस्तखत कराने और अगवा कर मारपीट करने का आरोप

पीड़ित किसानों ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्हें हथियारबंद लोगों द्वारा धमकाया गया, मारपीट की गई और जान से मारने की धमकी देकर पहले से तैयार स्टांप पेपरों तथा कथित रजिस्ट्री दस्तावेजों पर जबरन हस्ताक्षर कराए गए।

एक किसान ने आरोप लगाया कि विरोध करने पर उसे चार पहिया वाहन में बैठाकर अगवा किया गया और खुज्जी नाला पार ले जाकर बेरहमी से पीटा गया।

पीड़ितों का कहना है कि घटना के बाद उन्हें चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने पुलिस या प्रशासन से शिकायत की तो पूरे परिवार को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।


आदिवासी भूमि को बचाने वाले कानूनों से बचने के लिए मुनीमों के नाम कराई गई रजिस्ट्री?

मामले का सबसे सनसनीखेज पहलू कथित फर्जी रजिस्ट्रियों से जुड़ा हुआ है।

किसानों का आरोप है कि आदिवासी भूमि के हस्तांतरण संबंधी कानूनी प्रतिबंधों से बचने के लिए सूदखोर ने आदिवासी किसानों की जमीन अपने नाम कराने के बजाय अपने ही आदिवासी मुनीम सोहन मंडावी के नाम पर रजिस्ट्री करवा दी।

किसानों के अनुसार सभी रजिस्ट्री दस्तावेजों में स्वतंत्र और निष्पक्ष गवाहों के बजाय कथित सूदखोर के अपने कर्मचारी और मुनीम ही गवाह बनाए गए हैं।

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह बताया जा रहा है कि आज भी संबंधित जमीनों पर खेती-किसानी और भौतिक कब्जा मूल किसानों का ही है। कथित खरीदारों द्वारा कभी जमीन पर वास्तविक कब्जा नहीं लिया गया।


2014 में तहसीलदार ने की थी कार्रवाई की अनुशंसा

पीड़ित किसानों का कहना है कि वर्ष 2014 में तहसील छुरिया द्वारा जांच के बाद मामले को गंभीर मानते हुए सूदखोर के खिलाफ कार्रवाई और किसानों की भूमि एवं ट्रैक्टर वापस दिलाने की अनुशंसा की गई थी।

इसके बाद डोंगरगांव एसडीएम द्वारा भी जिला कलेक्टर राजनांदगांव को प्रतिवेदन भेजा गया था। आरोप है कि इसके बावजूद वर्षों तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।


कोर्ट से भी नहीं मिला समाधान, 93 पेशियों के बाद भी न्याय अधूरा

न्याय की तलाश में किसानों ने सिविल कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया। हालांकि तकनीकी कारणों से न्यायालय ने मामले को राजस्व न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का विषय बताते हुए वापस भेज दिया।

वर्तमान में मामला अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) डोंगरगांव/मोहला के समक्ष लंबित है।

किसानों का दावा है कि वे पिछले दो वर्षों में 93 से अधिक पेशियां भुगत चुके हैं, लेकिन अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।


पूर्व सांसद की पहल पर मिला ट्रैक्टर, जमीन अब भी फंसी

किसानों के अनुसार उन्होंने पूर्व सांसद मधुसूदन यादव से भी मदद की गुहार लगाई थी। किसानों का दावा है कि उनके हस्तक्षेप के बाद एक ट्रैक्टर वापस मिल सका, लेकिन कृषि भूमि का विवाद आज भी जस का तस बना हुआ है।


कौन हैं पीड़ित किसान?

इस मामले में न्याय की मांग करने वाले किसानों में अरुणा नांदेश्वर, दीपक कुमार नांदेश्वर, मंगतूराम गोंड, भारतलाल साहू, राधेश्याम साहू, रामजीलाल निषाद, मुरारी श्याम, पिताम्बर साहू, गणेश राम, प्रेमदास सोनी, ताम्रध्वज नेताम और सोमनलाल नेताम शामिल हैं।


राष्ट्रपति से सामूहिक इच्छा मृत्यु की मांग की चेतावनी

आर्थिक, मानसिक और सामाजिक रूप से टूट चुके किसानों ने प्रशासन और सरकार को अंतिम चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि दो माह के भीतर उनकी जमीनें वापस नहीं दिलाई गईं तो वे परिवार सहित भूख हड़ताल पर बैठेंगे और राष्ट्रपति को सामूहिक इच्छा मृत्यु की अनुमति के लिए आवेदन भेजेंगे।

किसानों का कहना है कि उनकी पुश्तैनी जमीन ही उनके जीवन-यापन का एकमात्र साधन है। यदि यही उनसे छिन गई तो उनके सामने जीवन संकट खड़ा हो जाएगा।


प्रशासन के सामने बड़ा सवाल

यह मामला केवल भूमि विवाद का नहीं बल्कि कथित सूदखोरी, फर्जी दस्तावेज, कमजोर वर्गों के अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया में विलंब जैसे गंभीर मुद्दों से जुड़ा हुआ है।

अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन, राजस्व विभाग और राज्य सरकार इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कर पीड़ित किसानों को राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाती है।


Sansani Times Disclaimer:

यह समाचार पीड़ित किसानों द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति एवं उनके लगाए गए आरोपों पर आधारित है। समाचार में वर्णित सभी आरोप संबंधित पक्षों के दावे हैं। अंतिम सत्यता सक्षम न्यायालय एवं जांच एजेंसियों की जांच और निर्णय के अधीन होगी।

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