EXCLUSIVE | ₹2.69 करोड़ का पुल… स्वीकृति घोड़ागांव नाले की, निर्माण कहीं और?

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फाइल में एक जगह, जमीन पर दूसरी? घोड़ागांव पुल निर्माण को लेकर मुख्य सचिव तक पहुंची शिकायत, PWD की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी।
सरकारी निर्माण कार्यों में स्वीकृति जिस स्थान के लिए हो और निर्माण कहीं दूसरे स्थान पर होने का आरोप लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है। ऐसा ही एक मामला मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के घोड़ागांव से सामने आया है, जहां करीब ₹2.69 करोड़ की लागत से प्रस्तावित उच्चस्तरीय पुल एवं पहुंच मार्ग को लेकर शिकायत ने लोक निर्माण विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

ग्राम घोड़ागांव निवासी अजय कुमार नुरेटी ने इस मामले में शासन के मुख्य सचिव को शिकायत भेजकर उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की मांग की है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि शासन से घोड़ागांव नाले में पुल निर्माण के लिए स्वीकृति ली गई, लेकिन कथित तौर पर निर्माण कार्य किसी दूसरे नाले में कराया जा रहा है।

शिकायत में वर्ष 2024-25 के बजट से संबंधित करीब ₹269.94 लाख की प्रशासनिक स्वीकृति का उल्लेख किया गया है।

🔴 असली सवाल—स्वीकृति घोड़ागांव की तो निर्माण दूसरी जगह क्यों?

मामला केवल निर्माण स्थल का नहीं, बल्कि सरकारी स्वीकृति, DPR, तकनीकी स्वीकृति, कार्यादेश और वास्तविक निर्माण स्थल के बीच संभावित अंतर का है।

यदि स्वीकृत स्थल और वर्तमान निर्माण स्थल अलग हैं, तो सवाल उठता है—

क्या स्थल परिवर्तन की विधिवत अनुमति ली गई?
क्या संशोधित DPR तैयार हुई?
क्या नई तकनीकी स्वीकृति जारी की गई?
क्या सक्षम अधिकारी से लिखित मंजूरी ली गई?
और सबसे अहम—क्या विभागीय रिकॉर्ड में भी वही स्थान दर्ज है जहां पुल का निर्माण हो रहा है?

इन सवालों का स्पष्ट जवाब अब लोक निर्माण विभाग से अपेक्षित है।

📦 शिकायत में लगाए गए प्रमुख आरोप

शिकायतकर्ता के दावों के मुताबिक—

  • घोड़ागांव नाले में उच्चस्तरीय पुल निर्माण के लिए शासन से स्वीकृति मिली।
  • कार्य की प्रशासनिक स्वीकृति करीब ₹269.94 लाख बताई गई है।
  • आरोप है कि स्वीकृत स्थल के बजाय दूसरे नाले में निर्माण कराया जा रहा है।
  • शिकायत में पूर्व में भी घोड़ागांव नाले की स्वीकृति और कोहका नाले में निर्माण को लेकर सवाल उठाए जाने का उल्लेख है।
  • शिकायतकर्ता ने मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग की है।

महत्वपूर्ण: ये सभी बिंदु शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों/दावों पर आधारित हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर नहीं हुई है। संबंधित विभाग का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

⚠️ ₹2.70 करोड़ के काम पर 5 बड़े सवाल

1. शासन ने जिस नाले के लिए राशि स्वीकृत की, क्या उसी स्थान पर पुल का निर्माण हो रहा है?

2. यदि निर्माण स्थल बदला गया है तो इसकी लिखित अनुमति किस अधिकारी ने दी?

3. क्या स्थल परिवर्तन के बाद संशोधित प्रशासनिक एवं तकनीकी स्वीकृति जारी की गई?

4. घोड़ागांव और कोहका नाले से जुड़े पूर्व के कथित स्थल परिवर्तन की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई?

5. क्या स्वीकृत DPR, कार्यादेश और वास्तविक निर्माण स्थल में कोई अंतर है?

🔎 EXCLUSIVE INVESTIGATION: विभाग से पूछे जाने चाहिए ये 10 सवाल

01. मूल स्वीकृति में पुल का सटीक स्थान और चेनज क्या दर्ज है?

02. वर्तमान निर्माण स्थल का चेनज क्या है?

03. क्या स्वीकृत और वर्तमान निर्माण स्थल एक ही हैं?

04. यदि स्थल अलग है तो परिवर्तन का प्रस्ताव किस अधिकारी ने तैयार किया?

05. स्थल परिवर्तन को किस सक्षम प्राधिकारी ने मंजूरी दी?

06. क्या संशोधित DPR अथवा तकनीकी स्वीकृति जारी की गई?

07. कार्यादेश में पुल का कौन-सा स्थान दर्ज है?

08. निर्माण स्थल का विभागीय अधिकारियों ने कब-कब निरीक्षण किया?

09. अब तक किए गए भुगतान का आधार क्या है?

10. यदि शिकायत के आरोप गलत हैं, तो विभाग स्वीकृति, DPR, कार्यादेश और वर्तमान निर्माण स्थल से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?

📰 EDITORIAL | अब जांच फाइलों की नहीं, जमीन की होनी चाहिए!

घोड़ागांव पुल का मामला केवल एक पुल के निर्माण तक सीमित नहीं है। असली सवाल सरकारी धन के स्वीकृत उपयोग और वास्तविक क्रियान्वयन का है।

अगर स्वीकृति और निर्माण स्थल एक ही हैं, तो दस्तावेज और स्थल निरीक्षण से स्थिति आसानी से साफ हो सकती है। लेकिन अगर दोनों अलग हैं, तो स्थल परिवर्तन के पीछे अपनाई गई पूरी प्रशासनिक और तकनीकी प्रक्रिया सामने आनी चाहिए।

आखिर पैसा जनता का है।

इसलिए जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि करीब ₹2.70 करोड़ का पुल किस स्थान के लिए स्वीकृत हुआ और वास्तव में बन कहां रहा है?

अब गेंद लोक निर्माण विभाग के पाले में है।

शिकायत सही है या गलत—इसका फैसला आरोप-प्रत्यारोप से नहीं, बल्कि सरकारी रिकॉर्ड, स्वीकृत DPR, तकनीकी दस्तावेज और निष्पक्ष स्थल जांच से होना चाहिए।

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