लोक अदालत में केस निपट रहे या जवाबदेही दब रही? राष्ट्रपति से NALSA तक पहुंची शिकायत, शिवशंकर सिंह ने उठाए 10 बड़े सवाल

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प्रशासनिक लापरवाही से पैदा विवादों का समझौता ही समाधान तो जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही कौन तय करेगा? धारा 21 और कमजोर पक्ष की सहमति को लेकर भी उठे गंभीर सवाल

नई दिल्ली/रायपुर। लोक अदालतों को त्वरित, सुलभ और कम खर्च में विवादों के समाधान का प्रभावी माध्यम माना जाता है, लेकिन अब इसकी कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर जनहित के सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता शिवशंकर सिंह ने राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), संबंधित राज्यपाल और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SALSA) के समक्ष शिकायत/निवेदन प्रस्तुत कर नेशनल लोक अदालत की कार्यप्रणाली की स्वतंत्र समीक्षा और आवश्यक सुधारात्मक दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।

शिकायत का सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर किसी विवाद की जड़ किसी सरकारी अधिकारी या विभाग की कथित प्रशासनिक लापरवाही है, तो क्या वर्षों बाद लोक अदालत में समझौता करा देना ही पूरा न्याय है?

शिवशंकर सिंह का कहना है कि विवाद खत्म होना और विवाद पैदा करने वाले कारण की जवाबदेही तय होना दो अलग-अलग बातें हैं।

🔥 नेशनल लोक अदालत पर उठे 10 बड़े सवाल

1. प्रशासनिक लापरवाही की कीमत नागरिक क्यों चुकाए?

अगर किसी अधिकारी ने समय पर आवेदन का निराकरण नहीं किया और मामला विवाद या न्यायालय तक पहुंच गया, तो समझौते से पहले संबंधित अधिकारी की भूमिका की जांच क्यों नहीं होनी चाहिए?

2. वर्षों की देरी का जिम्मेदार कौन?

राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण, सीमांकन, रिकॉर्ड दुरुस्ती जैसी सेवाओं में वर्षों की देरी के कारण नागरिकों को कार्यालयों और अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। ऐसी देरी की जवाबदेही आखिर किसकी होगी?

3. क्या समझौता मूल प्रशासनिक गलती मिटा देता है?

गलत बिलिंग, सेवा में कमी, गलत रिकॉर्ड या विभागीय निर्णय से विवाद पैदा हुआ हो, तो पक्षकारों के बीच समझौता होने के बाद भी मूल गलती की जांच होनी चाहिए या नहीं?

4. कमजोर पक्ष की सहमति कितनी स्वतंत्र?

आर्थिक रूप से कमजोर, अशिक्षित या लंबे समय से सरकारी तंत्र से जूझ रहे व्यक्ति की सहमति वास्तव में स्वतंत्र और सूचित है या परिस्थितिजन्य मजबूरी का परिणाम—इसकी निगरानी कैसे होगी?

5. क्या समझौते के कानूनी परिणाम समझाए जाते हैं?

लोक अदालत के अवार्ड की अंतिमता और उसके कानूनी प्रभाव की जानकारी क्या प्रत्येक पक्षकार को स्पष्ट रूप से दी जाती है?

6. ‘तारीख पर तारीख’ के बाद समझौता क्यों?

यदि कोई मामला वर्षों तक लंबित रहा, तो केवल अंत में समझौते के जरिए फाइल बंद करने के बजाय न्यायिक देरी के कारणों की भी समीक्षा क्यों न हो?

7. लोक अदालत की सफलता का पैमाना क्या?

क्या सफलता केवल निपटाए गए मामलों की संख्या से तय होनी चाहिए या यह भी देखा जाना चाहिए कि कितने मामलों में वास्तविक, स्वैच्छिक और सूचित सहमति से समाधान हुआ?

8. सरकारी विभागों की जवाबदेही कौन तय करेगा?

बिजली, पानी, बैंकिंग, बीमा और अन्य सार्वजनिक सेवाओं में विभागीय लापरवाही से विवाद पैदा होने पर क्या केवल समझौता पर्याप्त है या जिम्मेदार अधिकारी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए?

9. दबाव में हुए समझौतों की निगरानी कौन करेगा?

यदि किसी पक्षकार ने भय, दबाव या आर्थिक मजबूरी में समझौता किया हो, तो उसकी शिकायत की स्वतंत्र जांच की व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

10. क्या निपटारे के आंकड़े ही सफलता का पैमाना बन रहे?

सबसे बड़ा नीतिगत सवाल यह है कि लोक अदालतों का लक्ष्य वास्तविक न्याय तक पहुंच बढ़ाना है या कहीं मामलों के निपटारे की संख्या बढ़ाना प्राथमिक लक्ष्य तो नहीं बन रहा?

धारा 21 को लेकर भी उठी चिंता

शिकायत में विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 21 का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि लोक अदालत में समझौते के आधार पर पारित अवार्ड सिविल कोर्ट की डिक्री के समान माना जाता है और पक्षकारों के लिए अंतिम एवं बाध्यकारी होता है।

इसी आधार पर शिकायतकर्ता ने मांग की है कि समझौते से पहले प्रत्येक पक्षकार को उसके कानूनी प्रभाव और अधिकारों की स्पष्ट जानकारी दी जाए। जरूरत पड़ने पर कमजोर पक्षकार को स्वतंत्र विधिक सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।

अनुच्छेद 39-A की भावना पर भी सवाल

शिकायत में संविधान के अनुच्छेद 39-A की भावना का हवाला देते हुए कहा गया है कि समान न्याय और प्रभावी विधिक सहायता केवल संवैधानिक सिद्धांत तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि इसकी वास्तविक पहुंच हर नागरिक तक होनी चाहिए।

शिकायतकर्ता ने प्रशासनिक देरी और कथित लापरवाही से पैदा होने वाले विवादों का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन कराने तथा ऐसे मामलों में लोक अदालत में समझौते से पहले प्रशासनिक जवाबदेही की समीक्षा की व्यवस्था विकसित करने की मांग की है।

सिर्फ जांच नहीं, व्यवस्था में बदलाव की मांग

शिवशंकर सिंह ने प्रशासनिक देरी से जुड़े मामलों का राष्ट्रीय स्तर पर अध्ययन, लंबे समय तक आवेदन लंबित रखने वाले अधिकारियों की जवाबदेही, समझौते से पहले कानूनी परिणामों की लिखित जानकारी और कमजोर पक्षकारों को स्वतंत्र विधिक सहायता देने की मांग की है।

इसके साथ ही दबाव या मजबूरी में समझौते को रोकने के लिए प्रभावी निगरानी, प्रशासनिक लापरवाही से जुड़े मामलों में मूल कारण की जांच, सार्वजनिक सेवाओं के लिए मजबूत शिकायत निवारण व्यवस्था और SALSA द्वारा लोक अदालतों के वास्तविक समझौतों तथा वापस भेजे गए मामलों की वार्षिक रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है।

शिकायतकर्ता ने स्वतंत्र अध्ययन समिति गठित कर लोक अदालत व्यवस्था की प्रभावशीलता की समीक्षा तथा जांच और कार्रवाई की रिपोर्ट लिखित रूप में उपलब्ध कराने की मांग भी रखी है।

शिवशंकर सिंह बोले—‘फाइल बंद होना ही न्याय नहीं’

शिवशंकर सिंह के मुताबिक, लोक अदालत न्याय व्यवस्था का विरोध नहीं है, बल्कि इसे और अधिक जवाबदेह तथा नागरिक-केंद्रित बनाने की मांग है।

उनका कहना है कि यदि किसी सरकारी अधिकारी की कथित लापरवाही से कोई विवाद पैदा हुआ और वर्षों बाद उसी नागरिक को समझौते के लिए लोक अदालत तक पहुंचना पड़ा, तो केवल दोनों पक्षों के बीच समझौता करा देना पर्याप्त नहीं माना जाना चाहिए। यह भी सामने आना चाहिए कि विवाद पैदा क्यों हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन था।

उन्होंने कहा कि न्याय का अर्थ केवल केस की फाइल बंद होना नहीं है। न्याय का मतलब यह भी है कि नागरिक के अधिकार सुरक्षित रहें, उसकी सहमति स्वतंत्र हो और सरकारी तंत्र की गलती का बोझ नागरिक पर न पड़े।

अब सरकार और विधिक सेवा संस्थाओं के सामने बड़ा सवाल

लोक अदालत भारतीय न्याय व्यवस्था में वैकल्पिक विवाद समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम है। इसकी विश्वसनीयता और प्रभावशीलता तभी और मजबूत हो सकती है, जब मामले के निपटारे के साथ-साथ विवाद की मूल वजह और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर भी ध्यान दिया जाए।

शिवशंकर सिंह की शिकायत ने इसी सवाल को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है—

“अगर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समय पर निभाता, तो क्या उस विवाद को लोक अदालत तक पहुंचने की जरूरत ही पड़ती?”

अब नजरें राष्ट्रपति सचिवालय, प्रधानमंत्री कार्यालय, NALSA और संबंधित राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों की संभावित कार्रवाई पर हैं। यदि शिकायत पर स्वतंत्र अध्ययन और सुधारात्मक कदम उठते हैं, तो यह पहल त्वरित न्याय के साथ प्रशासनिक जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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