53 वर्षीय मरीज की मौत से नव जीवन अस्पताल पर गंभीर सवाल! परिजनों ने लगाया लापरवाही, आयुष्मान और भुगतान में गड़बड़ी का आरोप

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कमर दर्द की शिकायत से इलाज शुरू, ऑपरेशन के बाद बिगड़ी हालत; परिजनों ने मांगी स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड से जांच

राजनांदगांव – शहर के नव जीवन मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल एवं डायग्नोस्टिक सेंटर में अर्जुनी निवासी 53 वर्षीय खेमन लाल सोनकर की उपचार के दौरान हुई मौत ने अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था और उपचार प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मृतक के परिजनों ने अस्पताल प्रबंधन एवं संबंधित चिकित्सकों पर चिकित्सकीय लापरवाही, उपचार प्रक्रिया में अनियमितता, भुगतान में पारदर्शिता की कमी और आयुष्मान योजना के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं।

हालांकि, परिजनों द्वारा लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे में पूरे मामले में दस्तावेजी साक्ष्यों और विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय के आधार पर निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी मानी जा रही है।

कमर दर्द से इलाज, फिर मस्तिष्क के ऑपरेशन पर सवाल

परिजनों का दावा है कि खेमन लाल सोनकर को मुख्य रूप से कमर में दर्द की शिकायत थी। उपचार के दौरान उनकी ऐसी स्थिति बनी जिसमें मस्तिष्क संबंधी ऑपरेशन किया गया। ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत बिगड़ने का आरोप लगाते हुए परिजनों ने सवाल उठाया है कि आखिर ऑपरेशन की चिकित्सकीय आवश्यकता क्या थी और इसके लिए कौन-कौन सी जांच कराई गई थीं?

परिवार की मांग है कि मरीज की पूरी मेडिकल हिस्ट्री, जांच रिपोर्ट, ऑपरेशन नोट, डॉक्टरों की सलाह, दवाओं का रिकॉर्ड और रेफरल दस्तावेजों की विशेषज्ञ चिकित्सकों से जांच कराई जाए।

अस्पताल की डायग्नोस्टिक सुविधाओं पर भी सवाल

शिकायतकर्ता परिवार ने अस्पताल के नाम में शामिल “डायग्नोस्टिक सेंटर” को लेकर भी सवाल उठाए हैं। आरोप है कि मरीज की आवश्यक जांचें अस्पताल में उपलब्ध सुविधाओं के बजाय बाहर स्थित डायग्नोस्टिक सेंटर से कराई गईं।

यदि जांच में यह आरोप सही पाया जाता है तो स्वास्थ्य विभाग के लिए यह भी जांच का विषय होगा कि अस्पताल के पंजीयन में कौन-कौन सी सुविधाएं घोषित हैं, उनमें से कितनी वास्तव में उपलब्ध हैं और अस्पताल द्वारा संचालित जांच सुविधाएं निर्धारित नियमों के अनुरूप हैं या नहीं।

सरकारी सेवा में डॉक्टर और निजी अस्पताल संचालन का आरोप

परिजनों की शिकायत में अस्पताल के संचालक एवं एमडी मेडिसिन डॉ. चेतन साहू को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि संबंधित चिकित्सक शासकीय अस्पताल में सीनियर रेजिडेंट के पद पर कार्यरत हैं और इसके साथ निजी अस्पताल के संचालन में भूमिका निभा रहे हैं।

यदि यह तथ्य सही है तो संबंधित चिकित्सक की नियुक्ति, सेवा शर्तें, निजी प्रैक्टिस की अनुमति, ड्यूटी रिकॉर्ड और निजी अस्पताल में उनकी भूमिका की सक्षम विभागीय स्तर पर जांच की मांग उठती है।

ऑपरेशन के बाद क्या हुआ? स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड से जांच की मांग

मामले का सबसे अहम पहलू मरीज की मौत से पहले और बाद की पूरी चिकित्सा प्रक्रिया है।

जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि—

  • मरीज की प्रारंभिक बीमारी क्या थी?
  • कौन-कौन सी जांच कराई गई?
  • ऑपरेशन का चिकित्सकीय आधार क्या था?
  • ऑपरेशन किस चिकित्सक ने किया?
  • ऑपरेशन के बाद मरीज की हालत कब और कैसे बिगड़ी?
  • मरीज को किस स्थिति में दूसरे अस्पताल के लिए रेफर किया गया?
  • रेफर किए जाने के समय मरीज की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति क्या थी?

परिजनों की मांग है कि इन सभी सवालों का जवाब स्वतंत्र विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की जांच से सामने लाया जाए।

“मरीज की मौत हो चुकी थी, फिर भी जीवित बताकर रेफर किया”—परिजनों का गंभीर आरोप

परिजनों ने एक और बेहद गंभीर आरोप लगाया है। उनका दावा है कि मरीज की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उसे जीवित बताकर दूसरे अस्पताल के लिए रेफर किया गया।

यह आरोप सही है या नहीं, इसका निर्धारण केवल रिकॉर्ड और विशेषज्ञ जांच के आधार पर ही संभव है। इसलिए मामले में रेफरल पेपर, मृत्यु प्रमाणपत्र, नर्सिंग चार्ट, मॉनिटरिंग शीट, ऑपरेशन नोट, एम्बुलेंस रिकॉर्ड और दूसरे अस्पताल में मरीज की स्थिति से संबंधित दस्तावेज सुरक्षित कर जांचे जाने की मांग की गई है।

अस्पताल परिसर के CCTV फुटेज और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड भी इस जांच में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं।

लाखों रुपये के नगद और PhonePe भुगतान का आरोप

परिवार ने उपचार के दौरान लाखों रुपये नगद और PhonePe के माध्यम से भुगतान लेने का भी आरोप लगाया है। परिजनों का कहना है कि कथित भुगतानों के बदले उन्हें समुचित बिल अथवा रसीद उपलब्ध नहीं कराई गई।

इस आरोप की पुष्टि के लिए अस्पताल की अकाउंटिंग एंट्री, बिलिंग रिकॉर्ड, रसीदें, बैंक लेनदेन और डिजिटल भुगतान से संबंधित दस्तावेजों की जांच आवश्यक होगी।

आयुष्मान कार्ड के इस्तेमाल ने बढ़ाए सवाल

परिवार का यह भी दावा है कि मरीज के उपचार में आयुष्मान कार्ड का इस्तेमाल किया गया था। यदि संबंधित अस्पताल उस समय आयुष्मान भारत PM-JAY योजना के तहत सूचीबद्ध था, तो जांच का एक महत्वपूर्ण बिंदु यह होगा कि मरीज के नाम पर किस उपचार पैकेज के तहत दावा किया गया और परिवार से अलग से कोई भुगतान लिया गया या नहीं।

जांच में प्री-ऑथराइजेशन, पैकेज क्लेम, डिस्चार्ज/रेफरल रिकॉर्ड, अस्पताल के बिल, भुगतान रसीदें और पोर्टल पर अपलोड किए गए दस्तावेजों का मिलान किए जाने की मांग की गई है।

यदि सरकारी योजना के तहत किए गए दावे और परिवार से कथित तौर पर लिए गए भुगतान में अंतर पाया जाता है तो मामला गंभीर वित्तीय एवं प्रशासनिक जांच का विषय बन सकता है।

नर्सिंग होम लाइसेंस से लेकर ICU-OT तक हो सत्यापन

शिकायतकर्ता पक्ष ने अस्पताल के पंजीयन और लाइसेंस की भी जांच की मांग की है।

स्वास्थ्य विभाग से यह पता लगाने की मांग की गई है कि—

✔ अस्पताल का वैध पंजीयन और लाइसेंस है या नहीं।
✔ घोषित चिकित्सा एवं डायग्नोस्टिक सुविधाएं वास्तव में उपलब्ध हैं या नहीं।
✔ डॉक्टरों एवं नर्सिंग स्टाफ की योग्यता और पंजीयन वैध हैं या नहीं।
✔ ऑपरेशन थिएटर और ICU की सुविधाएं निर्धारित मानकों के अनुरूप हैं या नहीं।
✔ मरीज का पूरा मेडिकल रिकॉर्ड संधारित किया गया या नहीं।
✔ परिजनों को आवश्यक उपचार संबंधी जानकारी एवं दस्तावेज उपलब्ध कराए गए या नहीं।
✔ अस्पताल की बिलिंग और भुगतान व्यवस्था नियमों के अनुरूप है या नहीं।
✔ आयुष्मान योजना में किए गए दावों और मरीज के परिवार से लिए गए कथित भुगतान में कोई विरोधाभास है या नहीं।

पुरानी शिकायतों की भी जांच की मांग

शिकायतकर्ता पक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि संबंधित चिकित्सक को लेकर पूर्व में भी शिकायतें सामने आई थीं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

ऐसे में यदि पूर्व में वास्तव में कोई शिकायत दर्ज हुई थी तो जांच एजेंसियों को यह देखना चाहिए कि उन शिकायतों पर संबंधित विभागों ने क्या कार्रवाई की थी और उनके निस्तारण का आधार क्या था।

किसी भी व्यक्ति या संगठन को केवल आरोपों के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन पूर्व शिकायतों का रिकॉर्ड उपलब्ध होने की स्थिति में उनकी जांच मौजूदा मामले की पृष्ठभूमि समझने में महत्वपूर्ण हो सकती है।

सामाजिक कार्यकर्ता ने उठाई संयुक्त जांच की मांग

सामाजिक कार्यकर्ता शिवशंकर सिंह ने मामले में किसी एक विभागीय अधिकारी से जांच कराने के बजाय स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड, स्वास्थ्य विभाग, नर्सिंग होम पंजीयन प्राधिकरण, आयुष्मान योजना की जांच एजेंसी और पुलिस प्रशासन के समन्वय से जांच कराने की मांग की है।

उनका कहना है कि मरीज की मौत से जुड़े हर पहलू की जांच दस्तावेजों और वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को वास्तविक तथ्य सामने मिल सकें।

अब जांच से सामने आएगा सच

खेमन लाल सोनकर की मौत के मामले में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह दुर्भाग्यपूर्ण चिकित्सकीय जटिलता थी या उपचार प्रक्रिया में ऐसी कोई गंभीर चूक हुई, जिसे जांच के बाद जिम्मेदारी तय करने की जरूरत है?

इसका जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि मेडिकल रिकॉर्ड, ऑपरेशन नोट, जांच रिपोर्ट, CCTV, रेफरल दस्तावेज, भुगतान रिकॉर्ड, आयुष्मान क्लेम और विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड की राय से ही सामने आ सकता है।

यदि जांच में चिकित्सकीय लापरवाही, नियमों का उल्लंघन, आर्थिक अनियमितता, आयुष्मान योजना में गलत दावा, रिकॉर्ड में हेरफेर या कोई अन्य अपराध प्रमाणित होता है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।

फिलहाल परिवार की मांग है कि मरीज की पूरी मेडिकल फाइल और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड सुरक्षित कर निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच कराई जाए, ताकि मौत की वास्तविक वजह और जिम्मेदारी दोनों स्पष्ट हो सकें।

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