भालू के हमले में युवक बुरी तरह घायल, स्ट्रेचर पर लादकर उफनती नदी कराई पार; 2 किमी तक ग्रामीणों ने उठाया, पुल की मांग तेज

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गरियाबंद में मानवता की मिसाल: कमर तक पानी और तेज बहाव के बीच घायल को लेकर नदी पार हुए ग्रामीण, अस्पताल में इलाज जारी

गरियाबंद। जिले के घटोद गांव में भालू के हमले से घायल एक युवक को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को बेहद खतरनाक हालात से गुजरना पड़ा। गांव तक पहुंचने के रास्ते में पुल नहीं होने के कारण घायल युवक को स्ट्रेचर पर बांधकर ग्रामीणों ने कंधों पर उठाया और कमर तक भरे पानी व तेज बहाव वाली बाघादही नदी को पार कराया। इस पूरी घटना ने एक ओर ग्रामीणों की जिंदादिली और इंसानियत की मिसाल पेश की, तो दूसरी ओर इलाके में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

खेत जाते समय दो भालुओं ने किया हमला

जानकारी के मुताबिक, घटोद गांव के कामेपुर क्षेत्र निवासी घनश्याम नागेश (36 वर्ष) सोमवार सुबह साइकिल से अपने खेत की ओर जा रहे थे। इसी दौरान रास्ते में अचानक दो भालू सामने आ गए। इससे पहले कि घनश्याम कुछ समझ पाते, दोनों भालुओं ने उन पर हमला कर दिया और उन्हें साइकिल से नीचे गिरा दिया।

भालुओं ने युवक के गुप्तांग, कंधे, पेट और जांघ सहित शरीर के कई हिस्सों को बुरी तरह नोच डाला। अचानक हुए हमले के बावजूद घनश्याम ने हिम्मत नहीं हारी।

भालुओं से अकेले भिड़ा घायल युवक

घनश्याम ने दोनों भालुओं का डटकर सामना किया। उन्होंने भालुओं की नाक पर कई वार किए और जोर-जोर से शोर मचाया। युवक के प्रतिरोध और शोर से दोनों भालू वहां से भाग गए।

हमले के बाद घायल घनश्याम कुछ देर तक एक पेड़ पर चढ़कर अपनी जान बचाए रहे। इसके बाद किसी तरह गांव की ओर निकल पड़े। रास्ते में उन्होंने एक नाला भी पार किया, लेकिन गांव की दहलीज तक पहुंचते-पहुंचते उनकी हालत इतनी बिगड़ गई कि वह बेहोश होकर गिर पड़े।

108 पहुंची, लेकिन नदी ने रोक दिया रास्ता

राहगीरों ने युवक को घायल हालत में देखा और इसकी सूचना परिजनों को दी। इसके बाद तत्काल 108 एंबुलेंस को बुलाया गया। एंबुलेंस गांव से करीब दो किलोमीटर पहले स्थित बाघादही नदी तक पहुंची, लेकिन नदी पर पुल नहीं होने के कारण आगे नहीं जा सकी।

इसके बाद ग्रामीण घायल युवक को बाइक के जरिए करीब दो किलोमीटर दूर नदी तक लेकर पहुंचे। एंबुलेंस से स्ट्रेचर निकाला गया। घायल को स्ट्रेचर पर बांधा गया और फिर कई ग्रामीणों ने उसे कंधों पर उठाकर नदी पार कराने का बीड़ा उठाया।

कमर तक पानी, तेज बहाव और कंधे पर स्ट्रेचर

ग्रामीणों के मुताबिक नदी में इस समय कमर तक पानी और तेज बहाव था। ऐसे में स्ट्रेचर समेत घायल को नदी पार कराना किसी चुनौती से कम नहीं था। जरा सी चूक होने पर घायल युवक के साथ स्ट्रेचर के भी नदी में बह जाने का खतरा था।

ग्रामीणों ने बेहद सावधानी से कदम बढ़ाते हुए आखिरकार घायल को नदी के दूसरे छोर तक पहुंचाया। नदी पार करने के बाद उसे एंबुलेंस के जरिए गरियाबंद जिला अस्पताल लाया गया, जहां उसका इलाज जारी है।

एक तरफ भालू का हमला, दूसरी तरफ सिस्टम की परीक्षा

यह घटना सिर्फ वन्यजीव हमले की कहानी नहीं है, बल्कि उन ग्रामीण इलाकों की तस्वीर भी सामने लाती है जहां आज भी गंभीर स्थिति में मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को खुद जान जोखिम में डालनी पड़ती है।

एक ओर युवक ने भालुओं से संघर्ष कर अपनी जान बचाई, तो दूसरी ओर ग्रामीणों ने उफनती नदी में उतरकर उसे अस्पताल तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। घटना ने यह भी दिखा दिया कि आपातकालीन सेवाओं की एंबुलेंस गांव तक पहुंचने के बावजूद पुल जैसी बुनियादी सुविधा के अभाव में कई बार अंतिम दूरी तय नहीं कर पाती।

ग्रामीणों ने की पुल निर्माण की मांग

घटना के बाद ग्रामीणों ने बाघादही नदी पर पुल निर्माण की मांग तेज कर दी है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में नदी का जलस्तर बढ़ने और तेज बहाव के कारण आवागमन बेहद मुश्किल हो जाता है। किसी गंभीर मरीज या दुर्घटना के मामले में समय पर अस्पताल पहुंचाना चुनौती बन जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि यदि नदी पर पुल बन जाए तो न केवल मरीजों और घायलों को समय पर अस्पताल पहुंचाया जा सकेगा, बल्कि बारिश के मौसम में गांव के लोगों की आवाजाही भी सुरक्षित हो सकेगी।

भालू के हमले से शुरू हुई यह घटना आखिरकार ग्रामीणों की एकजुटता और संघर्ष की कहानी बन गई—लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ गई कि आखिर कब बाघादही नदी पर पुल बनेगा, ताकि अगली बार किसी घायल को जिंदगी और मौत के बीच स्ट्रेचर पर नदी पार न करनी पड़े।

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