10 करोड़ की राजगामी जमीन लाखों में आबंटित? राजकोष को नुकसान या नियमों की अनदेखी, उच्चस्तरीय जांच की मांग

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राजगामी संपत्ति के मूल्यांकन और आबंटन प्रक्रिया पर उठे गंभीर सवाल, शिवशंकर सिंह न्यायालय और लोक सेवा आयोग जाने की तैयारी में

राजनांदगांव। राजगामी संपत्ति की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन के कथित रूप से लाखों रुपये में आबंटन को लेकर प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। शिकायतकर्ता पक्ष का दावा है कि जिस भूमि का बाजार मूल्य 10 करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा था, उसका आबंटन लाखों रुपये में किए जाने से राजगामी राजकोष को संभावित रूप से बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है।

मामला सामने आने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर जमीन का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया और आबंटन की प्रक्रिया किन नियमों के तहत पूरी की गई?

करोड़ों की जमीन लाखों में कैसे?

शिकायतकर्ता पक्ष ने भूमि के मूल्यांकन और आबंटन प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच की मांग की है। सवाल उठाया गया है कि यदि जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य करोड़ों रुपये था, तो सरकारी रिकॉर्ड में उसका मूल्यांकन किस आधार पर हुआ और किस प्रक्रिया के तहत कम राशि में आबंटन किया गया?

जांच में यह भी स्पष्ट करने की मांग की जा रही है कि आबंटन से पहले और बाद में फाइल पर किन अधिकारियों ने निर्णय लिए और क्या शासन के निर्धारित राजस्व नियमों एवं दिशा-निर्देशों का पूरी तरह पालन किया गया?

इन सवालों के जवाब जरूरी

पूरे मामले में शिकायतकर्ता पक्ष ने कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जांच की मांग की है—

  • जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य कितना था?
  • सरकारी रिकॉर्ड में भूमि का मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?
  • आबंटन के लिए कौन-कौन सी प्रक्रिया अपनाई गई?
  • फाइल पर किन अधिकारियों ने निर्णय लिए?
  • क्या राजगामी राजकोष को वास्तविक आर्थिक नुकसान हुआ?
  • यदि नुकसान हुआ तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
  • क्या किसी व्यक्ति या संस्था को अनुचित लाभ मिला?
  • क्या आबंटन प्रक्रिया में पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धात्मक प्रक्रिया का पालन किया गया?

शिवशंकर सिंह बोले—जांच से सामने आएगा सच

शिवशंकर सिंह का कहना है कि राजगामी संपत्ति जनता और शासन से जुड़ी संपत्ति है और किसी भी अधिकारी अथवा प्रभावशाली व्यक्ति को नियमों से ऊपर नहीं रखा जा सकता। उनका कहना है कि यदि जांच में गलत मूल्यांकन, नियमों की अनदेखी, पद के दुरुपयोग अथवा राजकोषीय नुकसान की पुष्टि होती है तो जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।

उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र, उच्चस्तरीय और दस्तावेज आधारित जांच कराने की मांग की है।

रिश्वत या मिलीभगत के आरोपों की भी चर्चा

मामले में भ्रष्टाचार, रिश्वत या मिलीभगत जैसे गंभीर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में यह जांच का विषय होगा कि वास्तव में जमीन के आबंटन में किसी प्रकार की अनियमितता या आर्थिक लाभ पहुंचाने की कोशिश हुई थी या नहीं।

यदि सक्षम जांच एजेंसी को भ्रष्टाचार अथवा रिश्वत के ठोस प्रमाण मिलते हैं, तो संबंधित लोगों के खिलाफ लागू कानूनों के तहत कार्रवाई की मांग की जा रही है। वहीं आरोप गलत पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों एवं अन्य पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

न्यायालय और लोक सेवा आयोग जाने की तैयारी

शिवशंकर सिंह ने संकेत दिया है कि यदि मामले में अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती है तो वे न्यायालय और लोक सेवा आयोग का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि पूरे प्रकरण की वैधानिक जांच कराकर जिम्मेदारी तय कराई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि करोड़ों की जमीन का आबंटन वास्तव में लाखों रुपये में हुआ है, तो मूल्यांकन रिपोर्ट से लेकर पूरी फाइल और निर्णय प्रक्रिया तक की जांच होनी चाहिए। साथ ही, यदि राजकोष को नुकसान हुआ है तो उसकी वसूली भी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

अब प्रशासन के सामने बड़ा सवाल

राजगामी संपत्ति से जुड़े इस मामले में अब निगाह प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है। क्या प्रशासन पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कराकर भूमि के मूल्यांकन और आबंटन की वास्तविकता सामने लाएगा? या फिर यह मामला भी फाइलों तक सीमित रह जाएगा?

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर जमीन की कीमत करोड़ों में थी, तो उसका आबंटन लाखों में किस आधार पर हुआ?

नोट: भूमि के बाजार मूल्य, आबंटन राशि और कथित अनियमितताओं से जुड़े दावों की स्वतंत्र पुष्टि जांच एवं संबंधित सरकारी अभिलेखों के आधार पर होना बाकी है।

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