
बालोद के मालीघोरी में ऐतिहासिक ‘कुकुर समाधि’ बनी जनआस्था का केंद्र, 25 गांवों के ग्रामीण कर रहे मंदिर के विकास की कोशिश; पुरातत्व विभाग की उपेक्षा पर उठे सवाल
बालोद। छत्तीसगढ़ में देवी-देवताओं के मंदिर और धार्मिक स्थलों से जुड़ी आस्था की कई कहानियां आपने सुनी होंगी, लेकिन बालोद जिले के डौण्डीलोहारा विकासखंड के ग्राम खपरी (मालीघोरी) में एक ऐसी जगह है, जहां एक वफादार कुत्ते की समाधि लोगों की अगाध आस्था का केंद्र बनी हुई है। ऐतिहासिक ‘कुकुर देऊर मंदिर’ और यहां स्थित कुकुर समाधि को लेकर कई पीढ़ियों से लोककथा चली आ रही है।
स्थानीय लोगों के मुताबिक यह मंदिर करीब आठवीं सदी से जुड़ा हुआ है और इसका पुरातात्विक महत्व भी है। मंदिर परिसर में प्राचीन पत्थरों पर लिपियों और विभिन्न आकृतियों के निशान बताए जाते हैं। यही वजह है कि यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ इतिहास और लोकसंस्कृति के लिहाज से भी खास माना जाता है।
आखिर कैसे बनी कुत्ते की समाधि?
मंदिर समिति के अध्यक्ष संजय दुबे और सचिव चिमनलाल पटेल के मुताबिक, पुराने समय में खपरी यानी मालीघोरी में बंजारों की बस्ती हुआ करती थी। मालीगोदी नाम के एक बंजारे के पास एक बेहद स्वामीभक्त कुत्ता था।
कहा जाता है कि क्षेत्र में अकाल पड़ने के दौरान आर्थिक मजबूरी में मालीगोदी को अपने कुत्ते को मालगुजार के पास गिरवी रखना पड़ा।
इसी बीच मालगुजार के घर चोरी हो गई। चोर चोरी का सामान पास के तालाब में छिपाकर चले गए। कुत्ते ने यह पूरा घटनाक्रम देख लिया था।
अगली सुबह कुत्ता मालगुजार को उस स्थान तक ले गया, जहां चोरी का सामान छिपाया गया था। सामान बरामद होने के बाद मालगुजार को कुत्ते की वफादारी का एहसास हुआ।
बताया जाता है कि मालगुजार ने कुत्ते के गले में एक पत्र बांधा, जिसमें उसकी स्वामीभक्ति और चोरी का सामान बरामद कराने की पूरी कहानी लिखी थी और उसे उसके मालिक के पास भेज दिया।
लेकिन कहानी ने यहां एक दर्दनाक मोड़ ले लिया।
अपने कुत्ते को वापस आता देखकर मालीगोदी गुस्से में आ गया और उसने बिना सच्चाई जाने कुत्ते को डंडे से पीट-पीटकर मार डाला। बाद में जब उसने कुत्ते के गले में बंधा पत्र पढ़ा तो उसे पूरी सच्चाई का पता चला।
अपनी गलती का एहसास होने के बाद मालीगोदी को बेहद पछतावा हुआ। कहा जाता है कि उसने उसी स्थान पर अपने वफादार कुत्ते की समाधि बनवाई।
लोकमान्यता है कि इसी घटना से आगे चलकर इस स्थान का नाम मालीगोदी से मालीघोरी पड़ा।
पत्थरों पर दर्ज हैं इतिहास के निशान
कुकुर देऊर मंदिर परिसर में मौजूद एक पत्थर पर कुछ प्राचीन लिपियों के साथ चंद्राकार आकृति, कुत्ते और बंजारों के काफिले जैसी आकृतियां होने की बात कही जाती है।
मंदिर की दीवारों पर भी पुराने चित्रों के अवशेष बताए जाते हैं।
परिसर में करीब 5 से 6 फीट ऊंची भगवान गणेश की प्रतिमा भी श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह प्रतिमा जमीन से निकली थी और समय के साथ इसका आकार बढ़ता गया।
इसके अलावा मंदिर परिसर में भगवान राम, मां सरस्वती, भगवान विश्वकर्मा, श्रीकृष्ण और शिवलिंग भी स्थापित हैं। परिसर में बजरंगबली की विशाल प्रतिमा भी मौजूद है।
सांप-बिच्छुओं के बीच भी श्रद्धालुओं की आस्था
मंदिर समिति और ग्रामीणों का दावा है कि मंदिर परिसर में अक्सर सांप और बिच्छू दिखाई देते हैं, लेकिन श्रद्धालुओं को इनसे नुकसान नहीं पहुंचता। इसे भी स्थानीय लोग मंदिर की विशेषता और चमत्कार से जोड़कर देखते हैं।
कुकुर देऊर मंदिर को लेकर क्षेत्र में कई तरह की धार्मिक मान्यताएं भी प्रचलित हैं। कुकुर खांसी और कुत्ते के काटने जैसी समस्याओं के उपचार के लिए भी लोग यहां पहुंचते हैं। हालांकि इन मान्यताओं का कोई वैज्ञानिक प्रमाण होने का दावा नहीं किया जा सकता, लेकिन स्थानीय लोगों की आस्था आज भी मजबूत है।
25 गांवों ने उठाया मंदिर के विकास का बीड़ा
सबसे बड़ी बात यह है कि मंदिर के विकास के लिए अब ग्रामीण स्वयं आगे आए हैं। करीब 25 गांवों के ग्रामीणों ने समिति बनाकर मंदिर परिसर के विकास और इसे धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास शुरू किया है।
मंदिर समिति की ओर से नवरात्रि में ज्योति कलश स्थापना, जसगान, रामधुनी, आदर्श विवाह सहित विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि इस ऐतिहासिक स्थल को सिर्फ धार्मिक स्थल के तौर पर नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और इतिहास से जोड़कर विकसित किया जाना चाहिए।
पुरातत्व विभाग पर उठ रहे सवाल
कुकुर देऊर मंदिर के पुरातात्विक महत्व को देखते हुए इसे पुरातत्व विभाग के संरक्षण में लिया गया है। लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि संरक्षण और विकास की दिशा में अपेक्षित काम नहीं हो रहा है।
यही वजह है कि अब स्थानीय लोगों की मांग है कि मंदिर परिसर का व्यवस्थित संरक्षण किया जाए, बुनियादी सुविधाएं विकसित की जाएं और इसे पर्यटन के नक्शे पर प्रमुखता से शामिल किया जाए।
स्कूलों में फिर पढ़ाई जाए कुकुर समाधि की लोककथा
स्थानीय लोगों के मुताबिक कुकुर समाधि से जुड़ी यह लोककथा कभी स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल थी, लेकिन बाद में इसे हटा दिया गया।
मंदिर समिति और अंचलवासियों की मांग है कि छत्तीसगढ़ की इस अनोखी लोककथा को दोबारा स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से परिचित हो सकें।
‘वफादारी’ की कहानी आज भी जिंदा
मालीघोरी की कुकुर समाधि आज सिर्फ एक समाधि नहीं है। यह वफादारी, गलती और पश्चाताप की उस लोकगाथा की निशानी है, जिसे ग्रामीण पीढ़ियों से संजोकर रखते आए हैं।
अब सवाल यही है कि जिस धरोहर को स्थानीय लोग अपनी मेहनत और जनसहयोग से बचाने में जुटे हैं, क्या शासन और पुरातत्व विभाग भी इसके संरक्षण और विकास के लिए गंभीर कदम उठाएगा?
मालीघोरी की कुकुर समाधि की कहानी आज भी लोगों को यही संदेश देती है—वफादारी की कोई कीमत नहीं होती, लेकिन उसकी पहचान हमेशा इतिहास में जिंदा रहती है।

🖋️ शशिकांत “सनसनी” देवांगन (शशि कुमार देवांगन)
👨👦 पिता: स्वर्गीय गिरधारी प्रसाद देवांगन
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📰 वर्ष 2010 से पत्रकारिता जगत में सक्रिय शशिकांत “सनसनी” देवांगन ने अपनी पहचान निर्भीक, निष्पक्ष और जनहित की पत्रकारिता से बनाई है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत समय दर्शन दैनिक अख़बार से राजनांदगांव जिला ब्यूरो चीफ के रूप में की। वर्ष 2012 में राजनांदगांव पत्रिका दैनिक से जुड़ने के बाद उन्हें “शशिकांत सनसनी” नाम से विशेष पहचान मिली।
🎙️ प्रिंट मीडिया के साथ-साथ उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में Swaraj Express, Lalluram.com, Anadi News, Sudarshan News, वंदे भारत न्यूज़ तथा AB News में स्पेशल रिपोर्टर और स्टेट हेड, Chhattisgarh के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं।
📺 वर्तमान में वे “सनसनी टाइम्स” YouTube चैनल एवं 🌐 SansaniTimes.in पोर्टल के संपादक के रूप में सक्रिय हैं।
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