वाह माइनिंग विभाग वाह! कार्रवाई को ठेंगा दिखाने वालों पर ऐसी मेहरबानी कि गाड़ी 4 दिन में घर पहुंच गई

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विभागीय कार्रवाई के दौरान चालक-मालिक फरार, फिर भी रिकॉर्ड समय में वाहन रिहा; उठ रहे कई सवाल

राजनांदगांव | शशिकांत सनसनी

अवैध खनिज परिवहन के खिलाफ कार्रवाई करने वाले माइनिंग विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। मामला धौराभाठा क्षेत्र का है, जहां अवैध खनिज परिवहन करते हुए पकड़ी गई एक वाहन को लेकर ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसकी चर्चा अब पूरे जिले में हो रही है।

जानकारी के अनुसार माइनिंग विभाग ने वाहन क्रमांक CG 08 AL 9243 को अवैध खनिज परिवहन के आरोप में पकड़ा था। विभागीय टीम वाहन को नियमानुसार थाना ले जाने की प्रक्रिया में थी। इसी दौरान कथित रूप से वाहन चालक ने बीच रास्ते वाहन रोक दिया, चाबी निकाल ली और वाहन मालिक के साथ मौके से फरार हो गया।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार विभागीय अधिकारी और कर्मचारी देखते रह गए, जबकि चालक और मालिक कार्रवाई को अधूरा छोड़कर मौके से निकल गए। सामान्य परिस्थितियों में इस तरह की घटना को विभागीय कार्रवाई में बाधा डालने और कानून की अवहेलना के रूप में देखा जाता है, जिस पर कड़ी कार्रवाई की अपेक्षा की जाती है।

लोगों को थी सख्त कार्रवाई की उम्मीद

घटना के बाद क्षेत्र में चर्चा थी कि अब संबंधित वाहन मालिक और चालक के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई होगी। लोगों को उम्मीद थी कि विभाग इस मामले को गंभीरता से लेते हुए ऐसा उदाहरण पेश करेगा, जिससे भविष्य में कोई भी व्यक्ति सरकारी कार्रवाई को चुनौती देने का साहस न कर सके।

लेकिन इसके उलट कुछ ही दिनों बाद ऐसा घटनाक्रम सामने आया जिसने लोगों को हैरान कर दिया।

महज चार दिन में वाहन रिहा

सूत्रों के अनुसार जिस वाहन ने विभागीय कार्रवाई के दौरान विवाद खड़ा किया था, वही वाहन मात्र चार दिनों के भीतर जुर्माना जमा कराकर रिहा कर दिया गया।

यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू हो गया। आम नागरिकों का कहना है कि कई मामलों में जब्त वाहन महीनों तक थानों और विभागीय परिसरों में खड़े रहते हैं, लेकिन इस मामले में इतनी तेजी आखिर कैसे दिखाई गई?

क्या सभी के लिए नियम समान हैं?

स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि विभागीय कार्रवाई के दौरान वाहन छोड़कर भाग जाना भी वाहन रिहाई में बाधा नहीं बनता, तो फिर कानून का भय आखिर किसके लिए है?

जनता के बीच यह चर्चा भी तेज है कि क्या कुछ मामलों में नियमों की व्याख्या अलग-अलग तरीके से की जाती है? यदि किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसा किया होता तो क्या उसे भी इतनी ही राहत और तत्परता मिलती?

व्यंग्य में उठ रहे सवाल

शहर के चौक-चौराहों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर लोग इस मामले को लेकर तरह-तरह की टिप्पणियां कर रहे हैं। व्यंग्यात्मक अंदाज में लोग कह रहे हैं कि शायद अब अवैध खनिज परिवहन का नया फॉर्मूला तैयार हो गया है—

“पकड़े जाओ, कार्रवाई के दौरान गाड़ी छोड़कर निकल जाओ, कुछ दिन इंतजार करो और फिर जुर्माना भरकर वाहन वापस ले जाओ।”

हालांकि यह जनचर्चा है, लेकिन इसके पीछे छिपे सवाल बेहद गंभीर हैं।

पारदर्शिता पर उठे प्रश्न

इस पूरे मामले ने विभागीय पारदर्शिता और कार्रवाई की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं। यदि वाहन की रिहाई पूरी तरह नियमानुसार हुई है, तो संबंधित विभाग को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि वाहन को किन परिस्थितियों और किस प्रक्रिया के तहत इतनी शीघ्रता से छोड़ा गया।

जनता जवाब चाहती है

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

  • विभागीय कार्रवाई के दौरान फरार होने की घटना को कितना गंभीर माना गया?
  • क्या चालक और वाहन मालिक के खिलाफ कोई अलग कानूनी कार्रवाई की गई?
  • वाहन की रिहाई की प्रक्रिया इतनी तेज कैसे पूरी हुई?
  • और यदि यही प्रक्रिया है, तो अन्य जब्त वाहन लंबे समय तक क्यों खड़े रहते हैं?

फिलहाल इन सवालों के जवाब संबंधित विभाग के पास हैं, लेकिन जनता की निगाहें अब उसी पर टिकी हुई हैं।

क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या कानून और नियम वास्तव में सभी के लिए समान हैं, या फिर कुछ मामलों में कार्रवाई से अधिक तेज उसकी “माफी” दौड़ती है।

(नोट: Sansani Times इस मामले में माइनिंग विभाग का पक्ष भी जानने का प्रयास करेगा। विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)

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