सरकारी स्कूलों में गायत्री मंत्र की अनिवार्यता पर ईसाई समाज का विरोध, सरकार से नियम में संशोधन की मांग

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संवैधानिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का हवाला देते हुए ईसाई समाज ने सचिव को सौंपा पत्र, अल्पसंख्यक विद्यार्थियों और शिक्षकों को छूट देने की मांग

रायपुर। राज्य सरकार द्वारा 16 जून से प्रदेश के सभी शासकीय विद्यालयों में सुबह और शाम की प्रार्थना के दौरान गायत्री मंत्र सहित विभिन्न मंत्रों के उच्चारण को अनिवार्य किए जाने के निर्णय पर ईसाई समाज ने आपत्ति जताई है। समाज का कहना है कि यह व्यवस्था अल्पसंख्यक समुदाय के विद्यार्थियों और शिक्षकों की धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ा संवेदनशील विषय है, इसलिए इसे सभी के लिए बाध्यकारी नहीं बनाया जाना चाहिए।

इसी संबंध में ईसाई समाज के अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने राज्य के सचिव को एक औपचारिक पत्र सौंपकर अपनी चिंताओं और मांगों से अवगत कराया है। पत्र में उन्होंने संविधान द्वारा प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकारों का उल्लेख करते हुए सरकार से इस नियम पर पुनर्विचार करने की अपील की है।

संविधान के अनुच्छेद 25 और 28 का दिया हवाला

पत्र में कहा गया है कि भारत का संविधान देश को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापित करता है तथा प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जीवन जीने और पूजा-पद्धति अपनाने की स्वतंत्रता प्रदान करता है।

ईसाई समाज का कहना है कि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को धर्म के पालन, प्रचार और आचरण की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 28 शासकीय या सरकारी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और विशेष धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर स्पष्ट प्रावधान करता है। ऐसे में किसी एक धर्म विशेष से जुड़े मंत्रों के उच्चारण को अनिवार्य करना संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।

धार्मिक आस्था और अंतःकरण की स्वतंत्रता का मुद्दा

ईसाई समाज के अध्यक्ष क्रिष्टोफर पॉल ने कहा कि गायत्री मंत्र हिंदू सनातन परंपरा का अत्यंत पूजनीय और सम्मानित मंत्र है तथा समाज उसके धार्मिक महत्व का सम्मान करता है। हालांकि, किसी अन्य धर्म के विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए इसे अनिवार्य करना उनकी व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं और अंतःकरण की स्वतंत्रता के विपरीत हो सकता है।

उन्होंने कहा कि शासकीय संस्थानों में कार्यरत शिक्षक और अध्ययनरत छात्र विभिन्न धार्मिक पृष्ठभूमियों से आते हैं। ऐसे में किसी धार्मिक मंत्र को अनिवार्य रूप से पढ़ने या उच्चारित करने की बाध्यता उन्हें असहज स्थिति में डाल सकती है।

समावेशी और सर्वधर्म समभाव वाले वातावरण की पैरवी

ईसाई समाज का मानना है कि विद्यालय शिक्षा का केंद्र होने के साथ-साथ सामाजिक समरसता और विविधता का भी प्रतीक होते हैं। लंबे समय से स्कूलों में सर्वधर्म समभाव और समावेशी वातावरण बनाए रखने की परंपरा रही है।

समाज ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि यदि किसी एक धर्म से जुड़े मंत्रों को अनिवार्य किया जाता है तो इससे अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों में अलगाव या असहजता की भावना विकसित हो सकती है। इसका प्रभाव उनके आत्मविश्वास, मानसिक विकास और शैक्षणिक वातावरण पर पड़ सकता है।

ईसाई समाज की प्रमुख मांगें

ईसाई समाज ने राज्य सरकार से निम्नलिखित मांगें की हैं—

  • अल्पसंख्यक समुदाय के छात्र-छात्राओं के लिए गायत्री मंत्र का उच्चारण अनिवार्य न किया जाए।
  • शासकीय विद्यालयों में कार्यरत ईसाई एवं अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के शिक्षकों को भी इस संबंध में स्वतंत्रता प्रदान की जाए।
  • विद्यार्थियों और शिक्षकों को अपनी धार्मिक आस्था एवं व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार प्रार्थना में शामिल होने या न होने का अधिकार दिया जाए।
  • प्रार्थना व्यवस्था को समावेशी और सभी धर्मों के प्रति सम्मानजनक बनाए रखने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए जाएं।

सरकार से सकारात्मक पहल की उम्मीद

ईसाई समाज ने उम्मीद जताई है कि राज्य सरकार संविधान की मूल भावना, धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करते हुए इस विषय पर संवेदनशीलता से विचार करेगी। समाज ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी धर्म या परंपरा का विरोध करना नहीं है, बल्कि सभी समुदायों के अधिकारों और भावनाओं का समान सम्मान सुनिश्चित करना है।

फिलहाल इस मुद्दे पर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है, लेकिन पत्र सौंपे जाने के बाद यह विषय प्रदेश में चर्चा का केंद्र बन गया है।

— Sansani Times Desk

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