PM मोदी के ‘हर घर जल’ मिशन पर खालको का ‘कमीशन’ भारी? खैरागढ़ PHED में फाइलों पर ‘चढ़ावा’ का आरोप

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शशिकांत सनसनी
राजनांदगांव / खैरागढ़।

देश के प्रधानमंत्री Narendra Modi लगातार “हर घर जल” मिशन को लेकर गंभीरता दिखा रहे हैं। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य है कि देश के अंतिम व्यक्ति तक स्वच्छ पेयजल पहुंचे। लेकिन खैरागढ़-छुईखदान-गंडई जिले में लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (PHED) के भीतर जो तस्वीर सामने आ रही है, वह इस मिशन की जमीनी हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।

विभाग के अधिकारी प्रदीप खालको पर ठेकेदारों और स्थानीय सूत्रों ने गंभीर आरोप लगाए हैं। आरोप है कि “हर घर जल” योजना के तहत किए गए कार्यों की फाइलें बिना “चढ़ावे” के आगे नहीं बढ़ रहीं। भुगतान अटका हुआ है, ठेकेदार आर्थिक संकट में हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में जल आपूर्ति की योजनाएं अधर में लटकी हुई हैं।


‘हर घर जल’ या ‘हर फाइल पर जल’?

दिल्ली से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हर घर तक पानी पहुंचाने की बात कर रहे हैं, लेकिन खैरागढ़ जिले में कथित तौर पर नारा बदल चुका है—

“जब तक न चढ़ेगा चढ़ावा, फाइल को नहीं मिलेगा बढ़ावा।”

स्थानीय ठेकेदारों का कहना है कि विभाग में ड्राइंग, एफएचटीसी (Functional Household Tap Connection) मार्किंग, रंग-कोडिंग और तकनीकी आपत्तियों के नाम पर फाइलों को जानबूझकर रोका जा रहा है।

सूत्रों का दावा है कि यह प्रक्रिया गुणवत्ता सुधार के लिए नहीं, बल्कि ठेकेदारों पर दबाव बनाने और कथित कमीशन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अपनाई जा रही है।


ठेकेदारों की हालत खराब, भुगतान अटका

कई ठेकेदारों ने आरोप लगाया है कि उन्होंने अपनी जमीन, गहने और संपत्ति गिरवी रखकर योजना के तहत काम पूरे किए, पाइपलाइन बिछाई, टंकियां बनाईं और गांवों तक जल पहुंचाने की व्यवस्था की। लेकिन अब महीनों से भुगतान लंबित है।

एक ठेकेदार ने नाम न छापने की शर्त पर कहा—

“काम पूरा हो चुका है, पाइप जमीन में गड़ चुके हैं, लेकिन बिल साहब की टेबल से आगे नहीं बढ़ रहा। हर बार नया नियम, नई आपत्ति और नई मांग सामने आ जाती है।”


सवाल—आखिर किसका संरक्षण?

सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर एक अधिकारी की इतनी हिम्मत कैसे हो सकती है कि वह प्रधानमंत्री की प्राथमिकता वाली योजना को ही प्रभावित कर दे?

क्या विभागीय स्तर पर किसी बड़े अधिकारी का संरक्षण प्राप्त है?
क्या मंत्रालय तक इस कथित ‘कमीशन कनेक्शन’ की डोर जुड़ी हुई है?
या फिर प्रशासनिक चुप्पी ही इस पूरे खेल को ताकत दे रही है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि जिस अधिकारी का पिछला रिकॉर्ड भी विवादों से घिरा रहा हो, उसे इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।


ग्रामीणों की प्यास, फाइलों में ‘वाष्पीकरण’

खैरागढ़-छुईखदान-गंडई के कई ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी जल संकट बना हुआ है। जिन गांवों में नल-जल योजना के तहत राहत पहुंचनी थी, वहां लोग आज भी टैंकर, हैंडपंप और अस्थायी जल स्रोतों पर निर्भर हैं।

ग्रामीणों का आरोप है कि योजना का लाभ कागजों में ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई दे रहा है।

एक बुजुर्ग ग्रामीण ने कहा—

“सरकार कहती है हर घर जल, लेकिन हमारे गांव में आज भी पानी के लिए लाइन लगानी पड़ती है।”


विभागीय चुप्पी भी सवालों के घेरे में

इतने गंभीर आरोपों के बावजूद विभागीय स्तर पर कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न तो जांच की कोई औपचारिक घोषणा हुई है और न ही भुगतान संबंधी विवादों पर कोई पारदर्शी स्थिति स्पष्ट की गई है।

यह चुप्पी अपने आप में कई संदेह पैदा कर रही है।


प्रशासन क्या करेगा?

अब निगाहें जिला प्रशासन और राज्य शासन पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या ठेकेदारों को समय पर भुगतान मिलेगा? क्या जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?

यदि प्रधानमंत्री की ड्रीम परियोजना ही जिला स्तर पर कथित कमीशन तंत्र की भेंट चढ़ रही है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर सीधा प्रहार है।


SANSANI TIMES का सीधा सवाल

जनता प्यासी है।
ठेकेदार बर्बाद हैं।
योजना अधर में है।
लेकिन यदि “प्रतिशत” तय है, तो जिम्मेदार कौन?

अब देखना यह है कि प्रशासन इस ‘वसूली एक्सप्रेस’ पर ब्रेक लगाता है या फिर इसे हरी झंडी मिलती रहती है।


(नोट: यह रिपोर्ट स्थानीय सूत्रों, ठेकेदारों और क्षेत्रीय शिकायतों के आधार पर तैयार की गई है। संबंधित पक्ष का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)

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