दुबे कृषि केंद्र के दस्तावेजों पर RTI की दस्तक, अब जवाबदेही से बचना मुश्किल

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बालोद – दुबे कृषि केंद्र, मरारपारा बालोद से जुड़े दस्तावेजों को लेकर सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी ने कृषि विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरटीआई आवेदक ने केंद्र के लाइसेंस, स्टॉक, बिल-वाउचर, जीएसटी और संबंधित कंपनियों से जुड़े मूल दस्तावेजों के अवलोकन की मांग की है। अब देखना होगा कि विभाग इन रिकॉर्ड को जांच के लिए सामने रखता है या मामला पत्राचार तक ही सीमित रह जाता है।

आरटीआई आवेदक यशवंत कुमार निषाद, ग्राम-बघमरा, तहसील बालोद ने वर्ष 2025 से 31 जुलाई 2026 तक की स्थिति से संबंधित रिकॉर्ड का अवलोकन मांगा है। आवेदन में दुबे कृषि केंद्र से जुड़े शैक्षणिक योग्यता प्रमाण पत्र, दवाई, खाद एवं बीज लाइसेंस, पीजीआर, टॉनिक और अन्य कृषि उत्पादों की मूल्य सूची, जीएसटी नंबर, फर्म का नाम, स्टॉक पंजी, बिल-वाउचर तथा संबंधित कंपनी के प्रिंसिपल सर्टिफिकेट जैसे दस्तावेजों को देखने की मांग की गई है।

लाइसेंस से स्टॉक तक, हर रिकॉर्ड की होगी पड़ताल

मांगे गए दस्तावेज कई अहम सवालों का जवाब दे सकते हैं। कृषि केंद्र के पास कौन-कौन से लाइसेंस हैं और उनकी वैधता कितनी है? स्टॉक रजिस्टर में दर्ज सामग्री वास्तविक उपलब्धता से मेल खाती है या नहीं? बिल-वाउचर खरीद-बिक्री के रिकॉर्ड से कितने मेल खाते हैं? संबंधित कंपनियों से अधिकृत कारोबार का प्रमाण मौजूद है या नहीं? इन सवालों की वास्तविक तस्वीर दस्तावेजों के परीक्षण के बाद ही स्पष्ट हो सकती है।

आवेदक ने यह भी स्पष्ट किया है कि दस्तावेजों के अवलोकन के बाद जिन पृष्ठों की आवश्यकता होगी, उनकी सत्यापित प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराई जाएं। यदि कोई रिकॉर्ड संबंधित कार्यालय में उपलब्ध नहीं है तो नियमानुसार उसे संबंधित कार्यालय को भेजने की मांग भी की गई है।

जवाबी पत्र में ‘व्यक्तिगत जानकारी’ का पेच

मामले में नया मोड़ तब आया जब कार्यालय की ओर से जवाबी पत्र में उल्लेख किया गया कि मांगी गई जानकारी में व्यक्तिगत जानकारी/विवरण शामिल होने के कारण संबंधित व्यक्ति की सहमति या असहमति आवश्यक है। इसके लिए पत्र प्राप्ति के पांच दिवस के भीतर जवाब देने को कहा गया है।

यहीं से पारदर्शिता और सूचना के अधिकार को लेकर सवाल और गंभीर हो जाते हैं। क्या मांगे गए दस्तावेजों में से कौन-सी जानकारी कानून के तहत उपलब्ध कराई जा सकती है और कौन-सी जानकारी अपवाद के दायरे में आती है—इसका स्पष्ट परीक्षण जरूरी है। महज व्यक्तिगत जानकारी का उल्लेख कर पूरे रिकॉर्ड को रोकना उचित होगा या नहीं, यह भी नियमों के अनुसार तय होना चाहिए।

किसानों से जुड़ा कारोबार, इसलिए रिकॉर्ड की पारदर्शिता जरूरी

दुबे कृषि केंद्र जैसे प्रतिष्ठानों का सीधा संबंध किसानों से होता है। खाद, बीज और कृषि दवाइयों की बिक्री, गुणवत्ता, उपलब्धता तथा स्टॉक रिकॉर्ड में किसी भी तरह की अनियमितता का सीधा असर किसानों पर पड़ सकता है। ऐसे में लाइसेंस और स्टॉक से लेकर खरीद-बिक्री के दस्तावेजों तक की पारदर्शी जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।

यह मामला किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि दस्तावेजों के आधार पर वास्तविक स्थिति सामने लाने का है। यदि रिकॉर्ड पूरी तरह नियमसम्मत हैं तो अवलोकन के बाद स्थिति साफ हो जाएगी। वहीं यदि दस्तावेजों में कोई विसंगति सामने आती है तो नियमानुसार जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

अब विभाग के सामने असली परीक्षा

आरटीआई ने दस्तावेजों के दरवाजे पर दस्तक दे दी है। अब असली परीक्षा कृषि विभाग की है। लाइसेंस से लेकर स्टॉक पंजी, बिल-वाउचर और कंपनी से जुड़े प्रमाणपत्रों तक रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच होती है या मामला केवल पत्राचार तक सीमित रहता है—इस पर निगाहें टिकी हैं।

रिकॉर्ड सही है तो उसे जांच के लिए सामने रखने में परेशानी क्यों? और यदि कोई कमी है तो जिम्मेदारी तय होने से बचना क्यों?

फिलहाल आरटीआई आवेदन ने पूरे मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल खड़ा कर दिया है। किसानों से जुड़े कारोबार में कागजी औपचारिकता से आगे बढ़कर निष्पक्ष दस्तावेजी परीक्षण, स्पष्ट जवाब और नियमानुसार कार्रवाई की जरूरत है।

अब गेंद कृषि विभाग के पाले में है—दस्तावेज खुलेंगे, तो तस्वीर भी साफ होगी।

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