मुरारगोटा में 70 साल की खेती पर फर्जीवाड़े का साया! 25 एकड़ सरकारी जमीन पर कथित हेरफेर का आरोप, 19 साल से जांच अधर में

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मोहला-मानपुर | सनसनी टाइम्स

छत्तीसगढ़ के मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के खड़गांव थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम मुरारगोटा में करीब 25 एकड़ सरकारी भूमि को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। शिकायतकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि जिस भूमि पर उनका परिवार पिछले लगभग 70 वर्षों से खेती करता आ रहा है, उसके राजस्व रिकॉर्ड में कथित रूप से हेरफेर कर एक बाहरी व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया। इतना ही नहीं, आरोप है कि बाद में उक्त भूमि का आगे विक्रय भी कर दिया गया। हालांकि, इन आरोपों की अभी तक स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना शेष है।

1958-59 से खेती का दावा

शिकायतकर्ता परिवार का कहना है कि उनके पूर्वज वर्ष 1958-59 से विवादित भूमि पर खेती कर रहे हैं। उनके अनुसार यह भूमि पुराने राजस्व अभिलेखों में “छोटे झाड़” और “बड़े झाड़ जंगल” के रूप में दर्ज है। परिवार का दावा है कि पूरे गांव के लोग इस तथ्य से परिचित हैं कि वे दशकों से इस भूमि का उपयोग खेती के लिए करते आ रहे हैं।

परिवार का आरोप है कि राजस्व अभिलेखों में कथित रूप से बिना वैधानिक प्रक्रिया, बिना ग्रामसभा की सहमति और बिना वास्तविक कब्जाधारियों को जानकारी दिए किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया गया।

ग्रामसभा के प्रस्तावों के बावजूद नहीं हुआ समाधान

शिकायतकर्ताओं के मुताबिक वर्ष 2007 से वे लगातार इस मामले को लेकर राजस्व अधिकारियों, जिला प्रशासन और अन्य संबंधित विभागों के समक्ष शिकायतें दर्ज करा रहे हैं। उनका कहना है कि ग्रामसभा ने भी कई बार प्रस्ताव पारित कर विवादित नाम हटाने और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की, लेकिन लगभग 19 वर्षों बाद भी मामले का अंतिम निराकरण नहीं हो सका।

परिवार का आरोप है कि जांच प्रक्रिया लगातार लंबित रखी गई, जिससे उन्हें न्याय नहीं मिल सका।

सरकारी भूमि के कथित विक्रय का आरोप

शिकायतकर्ताओं का यह भी आरोप है कि विवादित भूमि, जिसे वे सरकारी एवं वन प्रकृति की भूमि बताते हैं, उसका आगे किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय भी कर दिया गया। यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो यह मामला केवल राजस्व रिकॉर्ड में अनियमितता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी भूमि की सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करेगा।

हालांकि, इस कथित विक्रय और उससे जुड़े दस्तावेजों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है।

कई अहम सवाल खड़े करता है मामला

यह पूरा विवाद कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर रहा है—

  • क्या राजस्व रिकॉर्ड में किसी प्रकार की अनियमितता या छेड़छाड़ हुई?
  • क्या ग्रामसभा की वैधानिक भूमिका का पालन किया गया?
  • यदि भूमि वन अथवा सरकारी भूमि थी तो स्वामित्व परिवर्तन किस प्रक्रिया के तहत किया गया?
  • वर्षों से लंबित जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हो सकी?

इन सवालों के जवाब जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेंगे।

क्या कहते हैं कानून?

भूमि विशेषज्ञों के अनुसार यदि कोई भूमि पुराने अभिलेखों में वन भूमि, छोटे झाड़ अथवा बड़े झाड़ जंगल के रूप में दर्ज है, तो उसके संबंध में किसी भी प्रकार के नामांतरण, स्वामित्व परिवर्तन अथवा विक्रय के लिए निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होता है।

ऐसे मामलों में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959, वन संबंधी लागू कानूनों तथा अन्य संबंधित वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप जांच और निर्णय किया जाता है। यदि किसी स्तर पर रिकॉर्ड में अनियमितता पाई जाती है, तो संबंधित अधिकारियों एवं जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है।

अधिकारियों का पक्ष आना बाकी

फिलहाल इस मामले में संबंधित राजस्व विभाग, तहसील प्रशासन अथवा अन्य सक्षम अधिकारियों की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सन्नसनी टाइम्स इस मामले में प्रशासन का पक्ष भी प्रकाशित करेगा ताकि पाठकों के सामने सभी पक्ष निष्पक्ष रूप से रखे जा सकें।

निष्कर्ष

मुरारगोटा की यह जमीन विवाद की कहानी केवल 25 एकड़ भूमि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्व रिकॉर्ड की पारदर्शिता, सरकारी भूमि की सुरक्षा और ग्रामीणों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर मामला बन गया है। शिकायतकर्ताओं को उम्मीद है कि वर्षों से लंबित जांच जल्द पूरी होगी और यदि किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होगी।

(Disclaimer: इस समाचार में उल्लेखित आरोप शिकायतकर्ताओं द्वारा लगाए गए हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि अभी तक नहीं हो सकी है। संबंधित विभाग एवं अधिकारियों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर समाचार को अद्यतन किया जाएगा।)

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